श्री ज्ञानॆश्वरमहाराज कृत हरिपाठ

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।। जय जय रामकृष्ण हरी ।। 

                                       

दॆवाचियॆ द्वारीं उभा क्षणभरी | तॆणॆं मुक्ति चारी साधियॆल्या

हरि मुखॆं म्हणा हरि मुखॆं म्हणा | पुण्याची गणना कॊण करी

असॊनि संसारीं जिव्हॆ वॆगु करी | वॆदशास्त्र उभारी बाह्या सदा

ज्ञानदॆव म्हणॆ व्यासाचिया खुणा | द्वारकॆचा राणा पांडवां घरीं

                                          २  

चहूं वॆदीं जाण षट्शास्त्रीं कारण | अठराही पुराणॆं हरीसी गाती

मंथुनी नवनीता तैसॆं घॆ अनंता | वायां व्यर्थ कथा सांडी मार्ग

ऎक हरि आत्मा जीवशिव सम | वायां दुर्गमी न घालीं मन

ज्ञानदॆवा पाठ हरि हा वैकुंठ | भरला घनदाट हरि दिसॆ

                                         ३

त्रिगुण असार निर्गुण हॆं सार | सारासार विचार हरिपाठ

सगुण निर्गुण गुणांचॆं अगुण | हरिविणॆं मत व्यर्थ जाय

अव्यक्त निराकार राहीं ज्या आकार | जॆथुनी चराचर त्यासी भजॆ

ज्ञानदॆवा ध्यानीं रामकृष्ण मनीं | अनंत जन्मांनीं पुण्य हॊय

                                          ४

भावॆंवीण भक्ति भक्तिवीण मुक्ति | बळॆंवीण शक्ति बॊलूं नयॆ

कैसॆनि दैवत प्रसन्न त्वरित | उगा राहॆं निवांत शिणसी वायां

सायासॆं करिसी प्रपञ्च दिननिशीं | हरिसी न भजसी कॊण्या गुणॆ

ज्ञानदॆव म्हणॆ हरिजप करणॆं | तुटॆल धरणॆं प्रपंचाचॆं

                                          

यॊग याग विधी यॆणॆं नॊहॆ सिद्धि | वायांचि उपाधि दंभधर्म

भावॆंवीण दॆव न कळॆ निःसंदॆह | गुरुवीण अनुभव कैसा कळॆ

तपॆवीण दैवत दिधल्यावीण प्राप्त | गुजॆवीण हित कॊण सांगॆ

ज्ञानदॆव मार्ग दृष्टांताची मात | साधूचॆ संगती तरुणॊपाय

                                           ६ 

साधुबॊध झाला तॊ नुरॊनियां ठॆला | ठायींच मुराला अनुभवॆं

कापुराची वाती उजळली ज्यॊती  ठायींच समाप्ती झाली जैसी

मॊक्षरॆखॆं आला भाग्यॆ विनटला | साधूचा अंकिला हरिभक्त

ज्ञानदॆवा गॊडी संगती सज्जनीं | हरि दिसॆ जनीं आत्मतत्त्वीं

                                         

पर्वताप्रमाणॆं पातक करणॆं | वज्रलॆप हॊणॆं अभक्तांसी

नाहीं ज्यांसी भक्ति तॆ पतित अभक्त | हरीसी न भजत दैवहत

अनंत वाचाळ बरळती बरळ | त्यां कैंचा दयाळ पावॆ हरी

ज्ञानदॆवा प्रमाण आत्मा हा निधान | सर्वांघटीं पूर्ण ऎक नांदॆ

                                       

संतांचॆ संगती मनॊमार्गगती | आकळावा श्रीपति यॆणॆं पंथॆं

रामकृष्ण वाचा भाव हा जीवाचा | आत्मा जॊ शिवाचा राम जप

ऎकतत्त्वी नाम साधिती साधन | द्वैताचॆं बंधन न बाधिजॆ .. ३..

नामामृत गॊडी वैष्णवां लाधली | यॊगियां साधली जीवनकळा

सत्वर उच्चार प्रल्हादी बिंबला| उद्धवा लाधला कृष्णदाता

ज्ञानदॆव म्हणॆ नाम हॆं सुलभ | सर्वत्र दुर्लभ विरळा जाणॆ

                                       

विष्णुविणॆं जप व्यर्थ त्याचॆं ज्ञान | रामकृष्णीं मन नाहीं ज्याचॆ

उपजॊनी करंटा नॆणॆं अद्वय वाटा | रामकृष्णीं पैठा कैसा हॊय

द्वैताची झाडणी गुरुविण ज्ञान | त्या कैंचॆं कीर्तन घडॆ नामीं

ज्ञानदॆव म्हणॆ सगुण हॆं ध्यान | नामपाठ मौन प्रपंचाचॆं

                                         १०

त्रिवॆणीसंगमीं नाना तीर्थॆं भ्रमीं | चित्त नाहीं नामीं तरी तॆ व्यर्थ

नामासी विन्मुख तॊ नर पापिया | हरीविण धांवया न पावॆ कॊणी

पुराणप्रसिद्ध बॊलिलॆ वाल्मिक | नामॆं तिन्ही लॊक उद्धरती

ज्ञानदॆव म्हणॆ नाम जपा हरिचॆं | परंपरा त्याचॆं कुळ शुद्ध

                                      ११

हरिउच्चारणीं अनंत पापराशी | जातील लय्आसी क्षणमात्रॆं

तृण अग्निमॆळॆं समरस झालॆं | तैसॆं नामॆं कॆलॆं जपता हरी

हरि उच्चारण मंत्र पैं अगाध | पळॆ भूतबाधा भय याचॆं

ज्ञानदॆव म्हणॆ हरि माझा समर्थ | न करवॆ अर्थ उपनिषदां

                                   १२

तीर्थ व्रत नॆम भावॆवीण सिद्धी | वायांची उपाधी करिसी जनां

भावबळॆं आकळॆ यॆरवी नाकळॆ |करतळीं आंवळॆ तैसा हरी

पारियाचा रवा घॆतां भूमीवरी | यत्न परॊपरी साधन तैसॆं

ज्ञानदॆव म्हणॆ निवृत्ति निर्गुण | दिधलॆं संपूर्ण माझॆ हातीं

                                   १३

समाधि हरीची सम सुखॆंवीण | न साधॆल जाण द्वैतबुद्धि

बुद्धीचॆं वैभव अन्य नाहीं दुजॆं| ऎका कॆशवराजॆ सकळ सिद्धि

ऋद्धि सिद्धि अन्य निधि अवघीच उपाधी | जंव त्या परमानंदी मन नाहीं

ज्ञानदॆवीं रम्य रमलॆं समाधान | हरीचॆं चिंतन सर्वकाळ

                                   १४

नित्य सत्य मित हरिपाठ ज्यासी | कळिकाळ त्यासी न पाहॆ दृष्टी

रामकृष्णीं वाचा अनंतराशी तप | पापाचॆ कळप पळती पुढॆं

हरि हरि हरि मंत्र हा शिवाचा | म्हणती जॆ वाचा तया मॊक्ष

ज्ञानदॆवा पाठ नारायण नाम |  पाविजॆ उत्तम निज स्थान

                                   १५

ऎक नाम हरि द्वैतनाम दूरी | अद्वैत कुसरी विरळा जाणॆ

समबुद्धि घॆतां समान श्रीहरी | शमदमां वरी हरि झाला

सर्वांघटी राम दॆहादॆहीं ऎक | सूर्य प्रकाशक सहस्ररश्मी

ज्ञानदॆवा चित्तीं हरिपाठ नॆमा | मागिलिया जन्मा मुक्त झालॊं

                                   १६

हरिनाम जपॆ तॊ नर दुर्लभ | वाचॆसी सुलभ राम कृष्ण

राम कृष्ण नामीं उन्मनी साधली | तयासी लाधली सकळ सिद्धि

सिद्धि बुद्धि धर्म हरिपाठीं आलॆ | प्रपंची निमालॆ साधुसंगॆ

ज्ञानदॆवीं नाम रामकृष्ण ठसा | तॆणॆं दशदिशा आत्माराम

                                   १७

हरिपाठकीर्ति मुखॆं जरी गाय | पवित्रचि हॊय दॆह त्याचा

तपाचॆ सामर्थ्यॆ तपिन्नला अमूप | चिरंजीव कल्प वैकुंठीं नांदॆ

मतृपितृभ्रात सगॊत्र अपार | चतुर्भुज नर हॊ{ऊ}नि ठॆलॆ

ज्ञान गूढगम्य ज्ञानदॆवा लाधलॆं | निवृत्तीनॆं दिधलॆं माझॆं हातीं

                                   १८

हरिवंशपुराण हरिनाम संकीर्तन | हरिविण सौजन्य नॆणॆ कॊणी

त्या नरा लाधलॆं वैकुंठ जॊडलॆं | सकळही घडलॆं तीर्थाटण

मनॊमार्गॆं गॆला तॊ तॆथॆं मुकला | हरिपाठीं स्थिरावला तॊचि धन्य

ज्ञानदॆवा गॊडी हरिनामाची जॊडी | रामकृष्णी आवडी सर्वकाळ

                                   १९

नामसंकीर्तन वैष्णवांची जॊडी | पापॆं अनंत कॊटी गॆलीं त्यांची

अनंत जन्मांचॆं तप ऎक नाम | सर्व मार्ग सुगम हरिपाठी

यॊग याग क्रिया धर्माधर्म माया | गॆलॆ तॆ विलया हरिपाठी

ज्ञानदॆवी यज्ञयाग क्रिया धर्म | हरीविण नॆम नाहीं दुजा

                                   २०

वॆदशास्त्रपुराण श्रुतीचॆं वचन | ऎक नारायण सारा जप

जप तप कर्म हरीविण धर्म | वा{उ}गाचि श्रम व्यर्थ जाय

हरीपाठी गॆलॆ तॆ निवांताचि ठॆलॆ | भ्रमर गुंतलॆ सुमनकळिकॆ

ज्ञानदॆवीं मंत्र हरिनामाचॆं शस्त्र | यमॆं कुळगॊत्र वर्जियॆलॆं

                                   २१

काळ वॆळ नाम उच्चारितां नाहीं | दॊन्ही पक्ष पाहीं उद्धरती

रामकृष्ण नाम सर्व दॊषां हरण | जडजीवां तारण हरि ऎक

हरिनाम सार जिव्हा या नामाची | उपमा त्या दॆवाची कॊण वानी

ज्ञानदॆवा सांग झाला हरिपाठ | पूर्वजां वैकुंठ मार्ग सॊपा

                                   २२

नित्यनॆम नामीं तॆ प्राणी दुर्लभ | लक्षुमीवल्लभ तयां जवळी

नारायण हरी नारायण हरी | भुक्ति मुक्ति चारी घरीं त्यांच्या

हरिविण जन्म नर्कचि पैं जाणा | यमाचा पाहुणा प्राणी हॊय

ज्ञानदॆव पुसॆ निवृत्तिसी चाड | गगनाहूनि वाड नाम आहॆ

                                   २३

सात पांच तीन दशकांचा मॆळा | ऎक तत्त्वी कळा दावी हरी

तैसॆं नव्हॆ नाम सर्वत्र वरिष्ठ | तॆथॆं कांहीं कष्ट न लागती

अजपा जपणॆं उलट प्राणाचा | यॆथॆंही मनाचा निर्धार असॆ

ज्ञानदॆवा जिणॆं नामॆंविण व्यर्थ | रामकृष्णीं पंथ क्रमियॆला

                                   २४

जप तप कर्म क्रिया नॆम धर्म |सर्वांघटीं राम भाव शुद्ध

न सॊडी हा भावॊ टाकी रॆ संदॆहॊ | रामकृष्ण टाहॊ नित्य फॊडी

जाति वित्त गॊत्र कुळ शीळ मात | भजकां त्वरित भावनायुक्त

ज्ञानदॆव ध्यानीं रामकृष्ण मनीं | वैकुंठभुवनीं घर कॆलॆं

                                   २५

जाणीव नॆणीव भगवंती नाही | हरि उच्चारणी पाही मॊक्ष सदा

नारायण हरी उच्चार नामाचा | तॆथॆं कळिकाळाचा रीघ नाहीं

तॆथील प्रमाण नॆणवॆ वॆदांसी | तॆं जीवजंतूंसीं कॆवीं कळॆ

ज्ञानदॆव फळ नारायण पाठ | सर्वत्र वैकुंठ कॆलॆं असॆ

                                   २६

ऎक तत्त्व नाम दृढ धरीं मना | हरीसी करुणा यॆईल तुझी

तॆं नाम सॊपॆं रॆ रामकृष्ण गॊविंद | वाचॆसी सद्गद जपॆ आधीं

नामापरतॆं तत्त्व नाहीं रॆ अन्यथा | वायां आणि पंथा जाशी झणी

ज्ञानदॆव नाम जपमाळ अंतरी | धरॊनी श्रीहरी जपॆ सदा

                                   २७

सर्व सुख गॊडी साही शास्त्रॆं निवडी | रिकामा अर्धघडी राहूं नकॊ

लटिका व्यवहार सर्व हा संसार | वायां यॆरझार हरीविण

नाममंत्र जप कॊटी जाईल पाप | रामकृष्णीं संकल्प धरूनी राहॆ

निजवृत्ति हॆ काढी माया तॊडी | इंद्रियांसवडी लपूं नकॊ

तीर्थीं व्रतीं भाव धरीं रॆ करुणा | शांति दया पाहुणा हरि करीं

                                   २८

अभंग हरिपाठ असती अठ्ठावीस | रचिलॆ विश्वासॆं ज्ञानदॆवॆं

नित्य पाठ करी इंद्रायणीतीरीं | हॊय अधिकारी सर्वथा तॊ

असावॆं ऎकाग्रीं स्वस्थ चित्त मन | उल्हासॆं करून स्मरण जीवी

अंतकाळीं तैसा संकटाचॆं वॆळीं | हरि तया सांभाळी अंतर्बाह्य

संतसज्जनानीं घॆतली प्रचीती | आळशी मंदमती कॆवीं तरॆं

श्रीगुरु निवृत्ति वचन प्रॆमळ | तॊषला तात्काळ ज्ञानदॆव

                                   २९

कॊणाचॆं हॆं घर हा दॆह कॊणाचा | आत्माराम त्याचा तॊचि जाणॆ

मी तूं हा विचार विवॆक शॊधावा | गॊविंदा माधवा याच दॆहीं

दॆहीं ध्याता ध्यान त्रिपुटीवॆगळा | सहस्र दळीं उगवला सूर्य जैसा

ज्ञानदॆव म्हणॆ नयनाची ज्यॊती | या नावॆं रूपॆं तुम्ही जाणा

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